मिलावट के दौर में शुद्धता का संकल्प, सात पीढ़ियों की परंपरा को आगे बढ़ा रही एमबीए बेटी—युवाओं और महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
रिपोर्ट -पत्रकार राजेश श्रीवास्तव
जौनपुर। मूली, मक्का, इमरती और खासकर चमेली व केवड़ा तिल्ली के तेल की खुशबू से देशभर में पहचान बनाने वाला जौनपुर आज अपनी समृद्ध विरासत को बचाने की चुनौती से जूझ रहा है। बदलते दौर में जहां परंपरागत कारोबार धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं, वहीं शहर की एक बेटी ने अपनी 140 साल पुरानी पारिवारिक विरासत को बचाने का बीड़ा उठाकर न सिर्फ महिला सशक्तीकरण की मिसाल पेश की है, बल्कि युवाओं को भी यह संदेश दिया है कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी सफलता की नई इबारत लिखी जा सकती है।
1885 से कायम है खुशबू की यह विरासत
सन 1885 में स्थापित अंतूराम महावीर प्रसाद फर्म जौनपुर पिछले करीब 140 वर्षों से तिल्ली का तेल, चमेली तेल और केवड़ा जल तैयार करती आ रही है। सात पीढ़ियों से परिवार परंपरागत विधि से शुद्ध उत्पाद तैयार करता रहा है। कभी इस कारोबार की खुशबू दूर-दूर तक पहचान बनाती थी, लेकिन समय के साथ मिलावट, सस्ते उत्पादों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कुशल कारीगरों की कमी ने इस पारंपरिक व्यवसाय के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया।
वर्ष 2015 तक प्रतिष्ठान बंद होने की कगार पर पहुंच गया। वर्ष 2017 तक पुराने कारीगर भी धीरे-धीरे खत्म हो गए और नई पीढ़ी के इस काम से दूर होने के कारण मैनपावर का संकट गहरा गया।
पिता की बीमारी ने बेटी को लौटाया जौनपुर
इसी बीच परिवार पर एक और संकट आया। फर्म के संचालक संजय साहू गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। उस समय उनकी 30 वर्षीय बेटी वैशाली साहू 2015-16 में बीबीडी लखनऊ से एमबीए करने के बाद नौकरी की तैयारी कर रही थीं। लेकिन पिता की बीमारी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
वैशाली ने नौकरी की तैयारी छोड़कर पहले पिता के इलाज और परिवार को संभाला। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने पारिवारिक कारोबार को समझना शुरू किया और उसकी कमान अपने हाथों में ले ली। वर्ष 2025 में पिता के निधन के बाद कारोबार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
‘मुनाफे से ज्यादा जरूरी है शुद्धता’
वैशाली कहती हैं, “पिता जी के जाने के बाद मैंने ठान लिया कि अपने पूर्वजों के इस धंधे और जौनपुर की पहचान को खत्म नहीं होने दूंगी। मेरे लिए मुनाफा नहीं, शुद्धता ज्यादा मायने रखती है। अगर गुणवत्ता से समझौता किया तो परिवार और जिले दोनों की छवि खराब होगी।”
आज बाजार में सस्ते और मिलावटी उत्पादों की भरमार के बावजूद वैशाली तिल्ली, चमेली और केवड़ा के शुद्ध उत्पाद तैयार करने के अपने संकल्प पर कायम हैं। उन्हें आर्थिक रूप से भले ही उतना लाभ न मिल रहा हो, लेकिन उनके लिए यह कारोबार सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत और जौनपुर की पहचान है।
युवाओं के लिए संदेश—अपनी जड़ों को कमजोरी नहीं, ताकत बनाएं
वैशाली की कहानी उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो रोजगार और सफलता की तलाश में अपनी पारंपरिक विरासत से दूरी बना लेते हैं। उन्होंने दिखाया कि आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक ज्ञान को साथ लेकर चला जाए तो विरासत को नया जीवन दिया जा सकता है।
एमबीए की पढ़ाई करने वाली वैशाली चाहतीं तो नौकरी की राह चुन सकती थीं, लेकिन उन्होंने परिवार की जरूरत और अपनी मिट्टी की पुकार को प्राथमिकता दी। पिता की बीमारी से लेकर उनके निधन के बाद कारोबार की जिम्मेदारी संभालने तक उन्होंने जिस धैर्य और साहस का परिचय दिया, वह युवाओं के लिए संघर्ष के बीच आगे बढ़ने की प्रेरणा है।
महिला सशक्तीकरण की जीवंत मिसाल
वैशाली की कहानी यह भी साबित करती है कि महिलाएं सिर्फ परिवार की जिम्मेदारियां निभाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कठिन परिस्थितियों में व्यवसाय की कमान संभालकर अपनी पहचान भी बना सकती हैं। उन्होंने न सिर्फ एक पारंपरिक कारोबार को संभाला, बल्कि पुरुष-प्रधान माने जाने वाले व्यवसाय में अपने निर्णय और नेतृत्व क्षमता से जगह बनाई।
आज वैशाली अकेले एक प्रतिष्ठान नहीं चला रहीं। वह सात पीढ़ियों की मेहनत, 140 वर्षों की परंपरा और जौनपुर की पहचान को आगे बढ़ा रही हैं।
उनकी कहानी का संदेश साफ है—विरासत तभी जिंदा रहती है, जब कोई उसे बचाने का साहस करता है। वैशाली ने वह साहस दिखाया है। जौनपुर की यह बेटी आज अपनी मेहनत से शहर की 140 साल पुरानी खुशबू को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश में जुटी है।

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