लेखक -संजय अस्थाना-वरिष्ठ पत्रकार
जौनपुर में बरसात ने एक बार फिर विकास के तमाम दावों की पोल खोल दी है। शहर की सड़कों का धंसना, जगह-जगह जलभराव होना, नालियों का उफनना और घंटों पानी जमा रहना अब महज असुविधा नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता का प्रमाण बन चुका है। सवाल यह नहीं है कि बारिश क्यों हुई। सवाल यह है कि हर वर्ष बारिश होने के बावजूद शहर जलभराव से निपटने के लिए तैयार क्यों नहीं होता आखिर सड़कें इस तरह क्यों धंस जाती हैं? नालियां समय रहते साफ क्यों नहीं होतीं जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनती? करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कुछ घंटों की बारिश में सड़कें तालाब क्यों बन जाती हैं?
विडंबना देखिए एक सड़क बन जाए, एक नाली बन जाए या कहीं खड़ंजा लग जाए तो उसका श्रेय लेने के लिए जनप्रतिनिधियों के बीच होड़ दिखाई देती है। भाषण होते हैं, उपलब्धियां गिनाई जाती हैं और विकास का ढिंढोरा पीटा जाता है। लेकिन जब वही सड़क बरसात में धंस जाती है, नाली जवाब दे देती है और जनता घुटनों तक पानी में चलने को मजबूर होती है, तब श्रेय लेने वाले चेहरे जिम्मेदारी लेने के लिए सामने क्यों नहीं आते?
एक पत्रकार वार्ता में विकास कार्यों को लेकर जिस आत्मविश्वास और सख्त लहजे में बड़े-बड़े दावे किए गए थे, उनकी असली परीक्षा अब जनता की आंखों के सामने हो रही है। विकास का मूल्यांकन मंचों और प्रेसवार्ताओं से नहीं, बल्कि बारिश के बाद सड़क पर जमा पानी और धंसी हुई सड़क से होता है। यदि किसी सड़क या नाली के निर्माण में तकनीकी मानकों की अनदेखी हुई है, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता खराब है या जलनिकासी की समुचित योजना के बिना कार्य कराया गया है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए जनता यह जानना चाहती है कि इन कार्यों की निगरानी किस अधिकारी ने की? भुगतान किस आधार पर हुआ? गुणवत्ता की जांच किसने की? और यदि कार्य में कमी है तो कार्रवाई किस पर होगी?
यह भी तय होना चाहिए कि किसी विकास कार्य का उद्घाटन और श्रेय लेने वाला जनप्रतिनिधि क्या उस कार्य की गुणवत्ता और उपयोगिता के प्रति भी सार्वजनिक रूप से जवाबदेह है?
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल फीता काटने और शिलापट्ट लगाने के लिए नहीं होते। उनका सबसे बड़ा दायित्व जनता की समस्याओं के समय उसके साथ खड़ा होना है। अधिकारी भी केवल कागजों में योजनाएं पूरी करने के लिए नहीं हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि जनता के पैसे से कराया गया प्रत्येक निर्माण टिकाऊ, गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी हो।
जौनपुर को अब फोटो खिंचवाने वाले विकास से आगे बढ़कर जवाबदेह विकास चाहिए। शहर में पिछले वर्षों में कराए गए सड़क, नाली और जलनिकासी के कार्यों का निष्पक्ष तकनीकी ऑडिट कराया जाना चाहिए। जहां सड़क धंसी है, वहां कारण सामने आना चाहिए। जहां नाली विफल हुई है, वहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और जहां सरकारी धन के दुरुपयोग या निर्माण में अनियमितता मिले, वहां कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। क्योंकि सवाल किसी एक दल, नेता या अधिकारी का नहीं है। सवाल जौनपुर की जनता के पैसे और उसके अधिकार का है। जनता ने जनप्रतिनिधियों को इसलिए चुना है कि वे उसकी समस्याओं का समाधान करें न कि केवल उपलब्धियों का श्रेय लें। अब समय आ गया है कि विकास के दावों का मूल्यांकन प्रेसवार्ता में नहीं, जनता की अदालत में हो।
बारिश हर साल होगी। पानी भी गिरेगा। लेकिन शहर हर साल क्यों डूबे इस सवाल का जवाब जौनपुर की जनता मांग रही है।और इस बार जनता को आश्वासन नहीं, जिम्मेदारी तय होते हुए देखना है।

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